رَبَّنَا إِنَّنَا آمَنَّا، فَاغْفِرْ لَنَا ذُنُوبَنَا، وَقِنَا عَذَابَ النَّارِ.
رَبَّنَا إِنَّنَا آمَنَّا فَاغْفِرْ لَنَا ذُنُوبَنَا وَقِنَا عَذَابَ النَّارِ
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ऐ हमारे पालनहार! निःसंदेह हम ईमान लाए। इसलिए हमारे गुनाह माफ़ कर दे और हमें दोज़ख़ के अज़ाब से बचा।
इस दुआ में «इग़फ़िर» (اغْفِرْ) और «क़िना» (قِنَا) के क्रियापद आए हैं। इसमें अपने ईमान को वसीला बनाकर गुनाहों की मग़फ़िरत माँगी गई है।
शैख़ अब्दुर्रहमान अस-सादी की तफ़सीर
“ऐ हमारे पालनहार! निःसंदेह हम ईमान लाए, इसलिए हमारे गुनाहों को क्षमा कर दे और हमें आग की यातना से बचा।” उन्होंने ईमान की तौफ़ीक़ देकर उन पर की गई अल्लाह की कृपा को वसीला बनाकर दुआ की कि वह उनके गुनाहों को क्षमा कर दे और उन गुनाहों के बुरे परिणामों—अर्थात आग की यातना—से उन्हें बचाए। इसके बाद अल्लाह ने तक़वा वालों के गुणों का विस्तार से वर्णन किया।
इमाम इब्न कसीर की तफ़सीर
अल्लाह अपने उन परहेज़गार बंदों का वर्णन करता है, जिनसे उसने बड़ा प्रतिफल देने का वादा किया है। अल्लाह ने फ़रमाया: “जो कहते हैं: ऐ हमारे पालनहार! निःसंदेह हम ईमान लाए”—अर्थात हम तुझ पर, तेरी किताब पर और तेरे रसूल पर ईमान लाए। “इसलिए हमारे गुनाहों को क्षमा कर दे”—अर्थात तुझ पर और जिस धर्म-विधान को तूने हमारे लिए निर्धारित किया है, उस पर हमारे ईमान के कारण; अपनी कृपा और दया से हमारे गुनाहों और अपने आदेशों के पालन में हमारी कोताही को क्षमा कर दे। “और हमें आग की यातना से बचा।”
अल-बग़वी की तफ़सीर
“जो कहते हैं”—यदि चाहो तो «الذين» को «للذين اتقوا» के साथ संबंध के कारण मज़रूर मान सकते हो; और यदि चाहो तो इसे مبتदा के रूप में मरफ़ूअ मान सकते हो। यह मंसूब भी हो सकता है, जिसका अनुमानित अर्थ है: “अर्थात उन लोगों को बताता हूँ जो कहते हैं।” “ऐ हमारे पालनहार! निःसंदेह हम ईमान लाए”—अर्थात हमने सत्य माना।
“इसलिए हमारे गुनाहों को क्षमा कर दे”—उन्हें हमसे ढाँप ले और हमें माफ़ कर दे। “और हमें आग की यातना से बचा।”
“सहीह अल-बुख़ारी” (हदीस संख्या 1145) में रात के अंतिम तिहाई हिस्से में मग़फ़िरत माँगने की फ़ज़ीलत का वर्णन आया है—उस समय जब पालनहार सबसे निचले आसमान पर उतरता है।