युद्ध में क्षमा और विजय की दुआ
رَبَّنَا اغْفِرْ لَنَا ذُنُوبَنَا، وَإِسْرَافَنَا فِي أَمْرِنَا، وَثَبِّتْ أَقْدَامَنَا، وَانْصُرْنَا عَلَى الْقَوْمِ الْكَافِرِينَ.
رَبَّنَا اغْفِرْ لَنَا ذُنُوبَنَا وَإِسْرَافَنَا فِي أَمْرِنَا وَثَبِّتْ أَقْدَامَنَا وَانْصُرْنَا عَلَى الْقَوْمِ الْكَافِرِينَ
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ऐ हमारे पालनहार! हमारे पापों को और हमारे मामले में हमसे होने वाली अति (ज़्यादती) को क्षमा कर दे। तथा हमारे पैरों को जमाए रख और काफ़िर क़ौम पर हमें विजय प्रदान कर।
रूप: «इग़फ़िर» (اغْفِرْ), «सब्बित» (ثَبِّتْ) और «उन्सुर» (انْصُرْ) क्रियाएँ। यह युद्धों के दौरान नबियों के धर्मनिष्ठ साथियों (रिब्बियून) की दुआ है। इसमें विजय माँगने से पहले अपने पापों और हद से बढ़ने की स्वीकारोक्ति शामिल है।
शैख़ अब्दुर्रहमान अस-सादी की तफ़सीर
फिर अल्लाह ने उनकी बात और अपने रब से सहायता माँगने का उल्लेख करते हुए कहा: «और उन कठिन अवसरों पर उनकी बात इसके सिवा कुछ न थी कि उन्होंने कहा: ऐ हमारे पालनहार! हमारे पापों और अपने मामले में हमारी हद से बढ़ने को क्षमा कर दे।» हद से बढ़ना यह है कि निषिद्ध चीज़ों की सीमा पार की जाए। उन्हें मालूम था कि पाप और हद से बढ़ना पराजय के सबसे बड़े कारणों में से हैं, और इनसे दूर होना विजय के कारणों में से है।
इसलिए उन्होंने अपने रब से इन्हें क्षमा करने की प्रार्थना की। फिर उन्होंने अपने धैर्य के प्रयास पर ही भरोसा नहीं किया, बल्कि अल्लाह पर निर्भर रहे और उससे प्रार्थना की कि काफ़िर शत्रुओं से सामना होने पर उनके क़दम जमा दे और उन्हें उन पर विजय प्रदान करे। इस प्रकार उन्होंने धैर्य और उसके विपरीत आचरण को छोड़ने, तौबा और क्षमा-याचना करने तथा अपने रब से सहायता माँगने—इन सबको एक साथ अपनाया। निस्संदेह, अल्लाह ने उनकी सहायता की और उन्हें दुनिया तथा आख़िरत में अच्छा परिणाम प्रदान किया।
इमाम इब्न कसीर की तफ़सीर
अर्थात, उनकी ज़बान पर इसके सिवा और कुछ न था: «ऐ हमारे पालनहार! हमारे पापों और अपने मामले में हमारी हद से बढ़ने को क्षमा कर दे, हमारे क़दम जमा दे और काफ़िर क़ौम के विरुद्ध हमारी सहायता कर।»
अल-बग़वी की तफ़सीर
अल्लाह के कथन «और उनकी बात» में «बात» «काना» का ख़बर है, जबकि उसका इस्म «यह कि उन्होंने कहा» में निहित है। इसका अर्थ है: अपने नबी की हत्या के समय उनकी बात इसके सिवा कुछ न थी कि उन्होंने कहा: «ऐ हमारे पालनहार! हमारे पापों को क्षमा कर दे»—अर्थात छोटे पापों को; «और अपने मामले में हमारी हद से बढ़ने को»—अर्थात बड़े पापों को; «और हमारे क़दम जमा दे»—ताकि वे डगमगाएँ नहीं; «और काफ़िर क़ौम के विरुद्ध हमारी सहायता कर।» [इससे आशय है:] ऐ मुहम्मद के साथियो, तुमने भी ऐसा क्यों नहीं किया और ऐसी ही बात क्यों नहीं कही?
सहीह अल-बुख़ारी (हदीस संख्या 2824) में युद्ध में दृढ़ रहने और कठिन परीक्षाओं के समय अल्लाह से सच्चे मन से दुआ करने की श्रेष्ठता का उल्लेख आया है।