दुआ 31 ज्ञान और सहजता 7 मिनट पढ़ने का समय

ज्ञान में वृद्धि की दुआ

नबी मुहम्मद ﷺ की दुआ 20:114
अरबी पाठ

رَبِّ زِدْنِي عِلْمًا.

رَبِّ زِدْنِي عِلْمًا

अरबी पाठ क़ुरआन से मात्राओं सहित लिया गया है। طه 20:114
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आवाज़
लिप्यंतरण रब्बि ज़िद्नी इल्मा
अर्थानुवाद
Azizul Haq Al-OmariHI

अतः सर्वोच्च है अल्लाह, जो सच्चा बादशाह है, और क़ुरआन को पढ़ने में जल्दी[39] न करें, इससे पूर्व कि आपकी ओर उसकी वह़्य पूरी की जाए तथा कहें : ऐ मेरे पालनहार! मुझे ज्ञान में बढ़ा दे।

अर्थ और विशेषता

इस दुआ में «ज़िद्नी» (زِدْنِي) आदेशवाचक रूप है, जिसका अर्थ है: “मेरे लिए बढ़ा दे।” क़ुरआन में एकमात्र चीज़ जिसके बढ़ने की दुआ करने का अल्लाह ने अपने नबी को आदेश दिया, वह धार्मिक ज्ञान (इल्म) है।

व्याख्या और सीख

शैख़ अब्दुर्रहमान अस-सादी की तफ़सीर

जब अल्लाह ने अपने बंदों के बारे में अपने प्रतिफल संबंधी फ़ैसले और अपनी उस धार्मिक आज्ञा का उल्लेख किया, जिसे उसने अपनी किताब में उतारा है—और यह सब उसकी बादशाही के प्रभावों में से है—तो उसने फ़रमाया: «अतः अल्लाह सर्वोच्च है» अर्थात् वह हर कमी और दोष से पाक, महान और बुलंद है। «बादशाह»—बादशाही उसका गुण है और सारी सृष्टि उसकी अधीन है। बादशाह के नियति-संबंधी और धार्मिक आदेश उन सब पर लागू होते हैं। «सच्चा» अर्थात् उसका अस्तित्व, उसकी बादशाही और उसकी पूर्णता सत्य हैं।

पूर्णता के गुण वास्तव में केवल महिमा और प्रताप वाले अल्लाह के ही हैं। इनमें से एक बादशाही भी है। उसकी सृष्टि में किसी और को यदि कुछ समय के लिए कुछ चीज़ों पर अधिकार मिले भी, तो वह सीमित और असत्य अधिकार है, जो समाप्त हो जाता है। इसके विपरीत, पालनहार की बादशाही कभी समाप्त नहीं होती; वह सदा जीवित, सबको सँभालने वाला और महान है।

«और क़ुरआन के साथ जल्दी न करें, इससे पहले कि उसकी वह़्य आपकी ओर पूरी कर दी जाए»—अर्थात् जब जिब्रील आपको क़ुरआन सुनाएँ तो उसे जल्दी-जल्दी ग्रहण न करें, बल्कि उनके पूरा कर लेने तक धैर्य रखें। जब वे पूरा कर लें, तब आप उसे पढ़ें। अल्लाह ने आपके सीने में उसे संकलित कर देने और आपके द्वारा पढ़वाने की ज़िम्मेदारी ली है, जैसा कि उसने फ़रमाया: «उसको शीघ्र याद करने के लिए अपनी ज़बान न हिलाएँ। निश्चय ही उसे संकलित करना और पढ़वाना हमारे ज़िम्मे है।

फिर जब हम उसे पढ़वाएँ, तो आप उसके पढ़वाने का अनुसरण करें। फिर उसका अर्थ स्पष्ट करना भी हमारे ज़िम्मे है»।

चूँकि नबी ﷺ का वह़्य को जल्दी ग्रहण करने और उसकी ओर तत्पर होने का व्यवहार ज्ञान के प्रति उनके पूर्ण प्रेम और उसकी लगन को दर्शाता था, इसलिए अल्लाह ने उन्हें आदेश दिया कि वे उससे ज्ञान में वृद्धि की दुआ करें। ज्ञान भलाई है और भलाई की अधिकता वांछनीय है; वह अल्लाह की ओर से है। ज्ञान पाने का मार्ग है—प्रयास करना, ज्ञान की लालसा रखना, अल्लाह से माँगना, उससे सहायता लेना और हर समय उसके सामने अपनी आवश्यकता प्रकट करना।

इस महान आयत से ज्ञान ग्रहण करने का शिष्टाचार भी समझ में आता है: ज्ञान सुनने वाले को ठहरना और धैर्य रखना चाहिए, यहाँ तक कि ज्ञान देने वाला और शिक्षक अपनी जुड़ी हुई बात पूरी कर ले। फिर यदि कोई प्रश्न हो तो पूछे; ज्ञान प्रस्तुत करने वाले की बात काटकर जल्दबाज़ी में प्रश्न न करे, क्योंकि इससे ज्ञान से वंचित होना पड़ सकता है। इसी प्रकार, जिससे प्रश्न किया जाए, उसे उत्तर देने से पहले प्रश्नकर्ता की बात ध्यान से सुननी और उसका आशय समझना चाहिए, क्योंकि इससे सही उत्तर देने में सहायता मिलती है।

इमाम इब्न कसीर की तफ़सीर

अल्लाह के फ़रमान «और क़ुरआन के साथ जल्दी न करें, इससे पहले कि उसकी वह़्य आपकी ओर पूरी कर दी जाए» का अर्थ वही है जो सूरह «ला उक़्सिमु बि-यौमिल-क़ियामह» में उसके फ़रमान का है: «उसको शीघ्र याद करने के लिए अपनी ज़बान न हिलाएँ। निश्चय ही उसे संकलित करना और पढ़वाना हमारे ज़िम्मे है। फिर जब हम उसे पढ़वाएँ, तो आप उसके पढ़वाने का अनुसरण करें। फिर उसका अर्थ स्पष्ट करना भी हमारे ज़िम्मे है»।

सहीह हदीस में इब्न अब्बास से प्रमाणित है कि रसूलुल्लाह ﷺ पर वह़्य ग्रहण करना कठिन होता था, इसलिए वे अपनी ज़बान हिलाते थे। तब अल्लाह ने यह आयत उतारी। अर्थात् जब जिब्रील वह़्य लेकर आते, तो जिब्रील जो भी आयत कहते, नबी ﷺ उसे उनके साथ-साथ दोहराते, क्योंकि क़ुरआन को याद रखने की उन्हें बहुत तीव्र लगन थी। तब अल्लाह ने उन्हें ऐसा तरीका बताया जो उनके लिए अधिक आसान और हल्का था, ताकि उन पर कठिनाई न हो।

उसने फ़रमाया: «उसको शीघ्र याद करने के लिए अपनी ज़बान न हिलाएँ। निश्चय ही उसे संकलित करना और पढ़वाना हमारे ज़िम्मे है»—अर्थात् हम उसे आपके सीने में संकलित करेंगे, फिर आप उसे लोगों के सामने पढ़ेंगे और उसमें से कुछ भी नहीं भूलेंगे। «फिर जब हम उसे पढ़वाएँ, तो आप उसके पढ़वाने का अनुसरण करें। फिर उसका अर्थ स्पष्ट करना भी हमारे ज़िम्मे है»।

इस आयत में अल्लाह का फ़रमान «और क़ुरआन के साथ जल्दी न करें, इससे पहले कि उसकी वह़्य आपकी ओर पूरी कर दी जाए» का अर्थ है: बल्कि ध्यान से सुनें; जब फ़रिश्ता आपको पढ़कर सुना चुका हो, उसके बाद आप पढ़ें। «और कहें: ऐ मेरे पालनहार! मेरे ज्ञान में वृद्धि कर» अर्थात् अपनी ओर से मुझे ज्ञान में वृद्धि प्रदान कर। इब्न उयैनह, अल्लाह उन पर दया करे, ने कहा: नबी ﷺ का ज्ञान बढ़ता ही रहा, यहाँ तक कि अल्लाह ने उन्हें मृत्यु दी।

इसी कारण हदीस में आया है: «अल्लाह अपने रसूल पर लगातार वह़्य भेजता रहा, यहाँ तक कि रसूलुल्लाह ﷺ के निधन के दिन वह़्य सबसे अधिक थी»।

इब्न माजा ने कहा: हमसे अबू बक्र इब्न अबी शैबा ने बयान किया; उनसे अब्दुल्लाह इब्न नुमैर ने, उनसे मूसा इब्न उबैदा ने, उनसे मुहम्मद इब्न साबित ने और उनसे अबू हुरैरा (अल्लाह उनसे प्रसन्न हो) ने बयान किया कि रसूलुल्लाह ﷺ कहा करते थे: «ऐ अल्लाह! जो कुछ तूने मुझे सिखाया है, उससे मुझे लाभ पहुँचा; मुझे वह सिखा जो मेरे लिए लाभकारी हो; और मेरे ज्ञान में वृद्धि कर। हर हाल में सारी प्रशंसा अल्लाह के लिए है»। इसे तिर्मिज़ी ने अबू कुरैब से, उन्होंने अब्दुल्लाह इब्न नुमैर से इसी सनद के साथ रिवायत किया।

उन्होंने कहा: यह इस मार्ग से ग़रीब है। बज़्ज़ार ने भी इसे अम्र इब्न अली अल-फ़ल्लास से, उन्होंने अबू आसिम से और उन्होंने मूसा इब्न उबैदा से रिवायत किया। इसके अंत में उन्होंने ये शब्द बढ़ाए: «और मैं जहन्नम वालों की दशा से अल्लाह की पनाह माँगता हूँ»।

अल-बग़वी की तफ़सीर

«अतः अल्लाह सर्वोच्च है, सच्चा बादशाह»—अल्लाह उन लोगों की नास्तिकतापूर्ण बातों और मुश्रिकों के कथनों से महान और पाक है।

«और क़ुरआन के साथ जल्दी न करें»—इससे नबी ﷺ अभिप्रेत हैं। जब जिब्रील उनके पास क़ुरआन लेकर उतरते, तो वे उनके साथ पढ़ने में जल्दी करते, इससे पहले कि जिब्रील अपनी तिलावत पूरी कर लें। ऐसा उन्हें क़ुरआन के छूट जाने और भूल जाने का डर होने के कारण होता था। इसलिए अल्लाह ने उन्हें इससे रोका और फ़रमाया: «और क़ुरआन के साथ जल्दी न करें» अर्थात् उसकी तिलावत में जल्दबाज़ी न करें।

«इससे पहले कि उसकी वह़्य आपकी ओर पूरी कर दी जाए»—अर्थात् जिब्रील संदेश पहुँचाना पूरा कर लें। इसका समान अर्थ अल्लाह का यह फ़रमान है: «उसको शीघ्र याद करने के लिए अपनी ज़बान न हिलाएँ» (सूरह अल-क़ियामा, 75:16)। याक़ूब ने «नक़्ज़ी» को नून पर फ़त्हा, ज़ाद पर कसरह और या पर फ़त्हा के साथ पढ़ा, तथा «वह़्यहु» को मंसूब पढ़ा। मुजाहिद और क़तादा ने कहा: इसका अर्थ है कि अपने साथियों को तब तक न पढ़ाएँ और न उन्हें सुनाएँ, जब तक उसके अर्थ आपके लिए स्पष्ट न हो जाएँ।

«और कहें: ऐ मेरे पालनहार! मेरे ज्ञान में वृद्धि कर»—अर्थात् क़ुरआन और उसके अर्थों का ज्ञान बढ़ा दे। यह भी कहा गया है कि जो ज्ञान तूने मुझे दिया है, उसके अतिरिक्त और ज्ञान प्रदान कर। इब्न मसऊद जब यह आयत पढ़ते, तो कहते: «ऐ अल्लाह! ऐ मेरे पालनहार! मेरे ज्ञान, ईमान और यक़ीन में वृद्धि कर»।

समर्थक हदीस

«सुनन इब्न माजा» (हदीस संख्या 925) में उम्म सलमा से रिवायत है कि नबी ﷺ फ़ज्र की नमाज़ के बाद हमेशा कहा करते थे: «ऐ अल्लाह! मैं तुझसे लाभकारी ज्ञान, पाकीज़ा रोज़ी और स्वीकार किया गया अमल माँगता हूँ!»

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