शैतानों से अल्लाह की शरण
رَبِّ أَعُوذُ بِكَ مِنْ هَمَزَاتِ الشَّيَاطِينِ، وَأَعُوذُ بِكَ. رَبِّ، أَنْ يَحْضُرُونِ.
رَبِّ أَعُوذُ بِكَ مِنْ هَمَزَاتِ الشَّيَاطِينِ وَأَعُوذُ بِكَ رَبِّ أَنْ يَحْضُرُونِ
ऑडियो लोड नहीं हो सका। बाद में फिर कोशिश करें।
तथा आप दुआ करें : ऐ मेरे पालनहार! मैं शैतानों की उकसाहटों से तेरी शरण चाहता हूँ। तथा ऐ मेरे पालनहार! मैं इस बात से भी तेरी शरण माँगता हूँ कि वे मेरे पास आएँ।
इस दुआ में «अऊज़ु बिका» (أَعُوذُ بِكَ) कहकर दो बार अल्लाह की शरण माँगी गई है। यह क्रोध के उकसावों, शैतानी वसवसों और शैतानों की उपस्थिति से सुरक्षा माँगने की प्रमाणित दुआ है।
शैख़ अब्दुर्रहमान अस-सादी की तफ़सीर
«और कहिए: ऐ मेरे पालनहार! मैं तेरी शरण चाहता हूँ» अर्थात् तेरी शक्ति और सामर्थ्य का सहारा लेता हूँ और अपनी शक्ति तथा सामर्थ्य से विरक्त होकर तेरी पनाह माँगता हूँ «शैतानों की उकसाहटों से»।
«और ऐ मेरे पालनहार! मैं तेरी शरण चाहता हूँ कि वे मेरे पास आएँ» अर्थात् मैं उस बुराई से तेरी पनाह माँगता हूँ जो उनके सीधे संपर्क, उकसाने और स्पर्श करने से मुझे पहुँचती है; और उस बुराई से भी जो उनके उपस्थित होने और वसवसा डालने के कारण होती है। यह हर प्रकार की बुराई के स्रोत और मूल से शरण माँगना है। इसमें शैतान की सभी उकसाहटों, उसके स्पर्श और वसवसे से शरण माँगना शामिल है।
जब अल्लाह अपने बंदे को इस बुराई से बचा लेता है और उसकी दुआ स्वीकार करता है, तो वह हर बुराई से सुरक्षित रहता है और हर भलाई की तौफ़ीक़ पाता है।
इमाम इब्न कसीर की तफ़सीर
«और ऐ मेरे पालनहार! मैं तेरी शरण चाहता हूँ कि वे मेरे पास आएँ» अर्थात् मेरे किसी भी मामले में। इसी कारण कामों की शुरुआत में अल्लाह का ज़िक्र करने का आदेश दिया गया है, क्योंकि यह खाना खाने, संभोग करने, ज़बह करने और अन्य कामों के समय शैतानों को दूर करता है। इसी सिलसिले में अबू दाऊद ने रिवायत किया है कि अल्लाह के रसूल ﷺ कहा करते थे: «ऐ अल्लाह!
मैं बुढ़ापे से तेरी शरण माँगता हूँ, ढहकर दब जाने और डूबने से तेरी शरण माँगता हूँ, और इस बात से तेरी शरण माँगता हूँ कि मृत्यु के समय शैतान मुझे भटकाकर गिरा दे»।
इमाम अहमद ने कहा: हमसे यज़ीद ने बयान किया, उन्होंने कहा: हमें मुहम्मद इब्न इस्ह़ाक़ ने अम्र इब्न शुऐब से, उन्होंने अपने पिता से और उन्होंने अपने दादा से बयान किया कि अल्लाह के रसूल ﷺ हमें कुछ शब्द सिखाते थे, जिन्हें हम नींद के समय भय लगने पर कहते थे: «अल्लाह के नाम से। मैं अल्लाह के पूर्ण शब्दों की शरण माँगता हूँ—उसके क्रोध और दंड से, उसके बंदों की बुराई से, शैतानों की उकसाहटों से और इस बात से कि वे मेरे पास आएँ»। अब्दुल्लाह इब्न अम्र अपने उन बड़े बच्चों को, जो समझ-बूझ रखते थे, इन्हें सोते समय पढ़ना सिखाते थे; और जो छोटे थे और याद नहीं कर सकते थे, उनके लिए ये शब्द लिखकर उनके गले में लटका देते थे।
इसे अबू दाऊद, तिर्मिज़ी और नसाई ने मुहम्मद इब्न इस्ह़ाक़ की रिवायत से बयान किया है। तिर्मिज़ी ने कहा: «ह़सन, ग़रीब»।
«और कहिए: ऐ मेरे पालनहार! मैं शैतानों की उकसाहटों से तेरी शरण चाहता हूँ»—अल्लाह ने अपने नबी को शैतानों से शरण माँगने का आदेश दिया, क्योंकि उनके साथ कोई उपाय काम नहीं आता और वे भलाई के आदेश के आगे नहीं झुकते। शरण माँगने के प्रसंग में हम पहले उल्लेख कर चुके हैं कि अल्लाह के रसूल ﷺ कहा करते थे: «मैं अल्लाह, सब कुछ सुनने वाले और सब कुछ जानने वाले की शरण माँगता हूँ, शापित शैतान से, उसकी उकसाहट, उसके फूँकने और उसके थूकने से»।
अल-बग़वी की तफ़सीर
«और ऐ मेरे पालनहार! मैं तेरी शरण चाहता हूँ कि वे मेरे पास आएँ»—अर्थात् मेरे किसी भी मामले में। यहाँ उनके उपस्थित होने का उल्लेख इसलिए किया गया है कि जब शैतान किसी के पास उपस्थित होता है, तो उसमें वसवसा डालता है। फिर अल्लाह ने बताया कि ये काफ़िर, जो पुनर्जीवन का इनकार करते हैं, मृत्यु को सामने देखकर दुनिया में लौटाए जाने की विनती करेंगे। इसके बाद उसने कहा:
«और कहिए: ऐ मेरे पालनहार! मैं तेरी शरण चाहता हूँ» अर्थात् मैं तेरी पनाह लेता और तेरा सहारा पकड़ता हूँ «शैतानों की उकसाहटों से»। इब्न अब्बास ने कहा: «उनकी उकसाहटें»। ह़सन ने कहा: «उनके वसवसे»। मुजाहिद ने कहा: «उनका फूँकना और थूकना»।
भाषाविदों ने कहा: «वे गुमराह करके पापों की ओर धकेलते हैं»। ‘हम्ज़’ का मूल अर्थ ज़ोर से धक्का देना है।
अबू दाऊद की «सुनन» (ह़दीस संख्या 3893) में अम्र इब्न शुऐब से रिवायत है कि नबी ﷺ सह़ाबा को सिखाते थे कि वे नींद में भय लगने पर ये शब्द पढ़ें।