رَبِّ فَلَا تَجْعَلْنِي فِي الْقَوْمِ الظَّالِمِينَ.
رَبِّ فَلَا تَجْعَلْنِي فِي الْقَوْمِ الظَّالِمِينَ
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तो ऐ मेरे पालनहार! मुझे उन अत्याचारी लोगों में शामिल न करना।
रूप: निषेधात्मक रचना «फ़ला तज्अल्नी» (فَلَا تَجْعَلْنِي)। यह उस दंड से बचाए जाने की दुआ है, जिसकी चपेट में पापी और अत्याचारी आते हैं।
शैख़ अब्दुर्रहमान अस-सादी की तफ़सीर
आयत 93 और 94 की तफ़्सीर: जब अल्लाह ने झुठलाने वालों के सामने अपने महान प्रमाण स्पष्ट कर दिए, लेकिन उन्होंने न उनकी ओर ध्यान दिया और न उन्हें स्वीकार किया, तो उन पर दंड अनिवार्य हो गया और उन्हें उसके उतरने की चेतावनी दी गई। अल्लाह ने अपने रसूल को यह कहने का निर्देश दिया: «कहो: मेरे पालनहार! यदि तू मुझे वह दिखा दे जिसकी उन्हें चेतावनी दी जा रही है»—अर्थात् जिस समय भी तू मुझे उनका दंड दिखाए और वहाँ उपस्थित करे—«तो मेरे पालनहार!
मुझे अत्याचारी लोगों में शामिल न करना»—अर्थात् जिन पापों के कारण वे दंड के पात्र हुए, उनसे मेरी रक्षा कर और मुझ पर दया कर; और उस दंड से भी मेरी हिफ़ाज़त कर जो उन पर उतरेगा, क्योंकि जब सामूहिक दंड उतरता है, तो वह अवज्ञाकारी और अन्य लोगों—दोनों को अपनी चपेट में ले लेता है।
इमाम इब्न कसीर की तफ़सीर
अल्लाह तआला इस दुआ के साथ दुआ करने का आदेश देता है, जब दंड आ पहुँचे: «मेरे पालनहार! यदि तू मुझे वह दिखा दे जिसकी उन्हें चेतावनी दी जा रही है»—अर्थात् यदि तू उन्हें दंड दे और मुझे यह सब देखते हुए उपस्थित रखे, तो मुझे उनके बीच न रखना। जैसा कि उस हदीस में आया है, जिसे इमाम अहमद ने रिवायत किया और तिर्मिज़ी ने इसे सहीह कहा: «और जब तू किसी क़ौम के लिए फ़ितना चाहे, तो मुझे फ़ितने में डाले बिना अपने पास उठा लेना।» यह उनके नबी मुहम्मद ﷺ की दुआ थी।
अल-बग़वी की तफ़सीर
«मेरे पालनहार» अर्थात्: ऐ मेरे पालनहार! «तो मुझे अत्याचारी लोगों में शामिल न करना» अर्थात्: उनके विनाश के साथ मेरा विनाश न करना।
इमाम अहमद के «मुस्नद» (संख्या 22125) में नबी ﷺ की यह दुआ रिवायत की गई है: «ऐ अल्लाह! यदि तू किसी क़ौम के लिए फ़ितना चाहे, तो मुझे फ़ितने में डाले बिना अपने पास उठा लेना!»