رَبِّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ، أَنْ أَسْأَلَكَ مَا لَيْسَ لِي بِهِ عِلْمٌ، وَإِلَّا تَغْفِرْ لِي، وَتَرْحَمْنِي أَكُنْ مِنَ الْخَاسِرِينَ.
رَبِّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ أَنْ أَسْأَلَكَ مَا لَيْسَ لِي بِهِ عِلْمٌ وَإِلَّا تَغْفِرْ لِي وَتَرْحَمْنِي أَكُنْ مِنَ الْخَاسِرِينَ
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नूह़ ने कहा : मेरे पालनहार! मैं तेरी शरण चाहता हूँ इस बात से कि मैं तुझसे ऐसी चीज़ का प्रश्न करूँ, जिस (की वास्तविक्ता) का मुझे कोई ज्ञान नहीं[13] और यदि तूने मुझे क्षमा नहीं किया और मुझपर दया नहीं की, तो मैं नुक़सान उठाने वालों में से हो जाऊँगा।
रूप: «मैं तेरी शरण चाहता हूँ» (أَعُوذُ بِكَ)—यह अल्लाह की पनाह माँगने और अपनी असमर्थता को विनम्रतापूर्वक स्वीकार करने का भाव है। नूह़ عليه السلام ने यह दुआ उस समय की, जब अल्लाह ने उन्हें अपने अविश्वासी बेटे के उद्धार की प्रार्थना करने पर ध्यान दिलाया।
शैख़ अब्दुर्रहमान अस-सादी की तफ़सीर
तब नूह़ عليه السلام को अपने किए पर बहुत गहरा पछतावा हुआ और उन्होंने कहा: «मेरे पालनहार! मैं तेरी शरण चाहता हूँ कि तुझसे ऐसी चीज़ माँगूँ जिसका मुझे ज्ञान नहीं। यदि तू मुझे क्षमा न करे और मुझ पर दया न करे, तो मैं घाटा उठाने वालों में से हो जाऊँगा»। क्षमा और दया के द्वारा ही बंदा घाटा उठाने वालों में शामिल होने से बचता है।
इससे यह बात स्पष्ट होती है कि नूह़ عليه السلام को यह ज्ञान नहीं था कि अपने बेटे को बचाने के लिए अपने पालनहार से प्रार्थना करना निषिद्ध है और उस आयत के अंतर्गत आता है: «और उन लोगों के विषय में मुझसे बात न करना जिन्होंने अत्याचार किया है; निश्चय ही वे डुबो दिए जाएँगे» (क़ुरआन 11:37)। बल्कि उनके सामने दो बातें परस्पर विरोध में थीं। उन्होंने समझा कि उनका बेटा «तुम्हारे परिवार» (क़ुरआन 11:40) में शामिल है। फिर बाद में उन पर स्पष्ट हुआ कि वह उन लोगों में शामिल है जिनके लिए दुआ करने और उनके विषय में बात करने से मना किया गया था।
इमाम इब्न कसीर की तफ़सीर
इब्न कसीर बताते हैं: «नूह़ عليه السلام ने अनुचित प्रार्थना करने से अल्लाह की शरण माँगी और डूबकर मर चुके अपने अविश्वासी बेटे के प्रति मानवीय करुणा दिखाने पर क्षमा माँगी»।
अल-बग़वी की तफ़सीर
«नूह़ ने कहा: मेरे पालनहार! मैं तेरी शरण चाहता हूँ कि तुझसे ऐसी चीज़ माँगूँ जिसका मुझे ज्ञान नहीं। यदि तू मुझे क्षमा न करे और मुझ पर दया न करे, तो मैं घाटा उठाने वालों में से हो जाऊँगा»।
«सहीह़ अल-बुख़ारी» (हदीस सं. 4712) में क़ियामत के दिन होने वाली महान सिफ़ारिश (शफ़ाअत) का वर्णन है, जिसमें नूह़ عليه السلام अपनी इसी प्रार्थना को याद करेंगे।